श्रीमद्भगवद्गीता- अध्याय-४
शान्ताकारम भुजकसयम पद्मनाम सुरेसम विश्वाधारम गगन सदृश्यम मेघ बर्णम सुभान्गम लक्ष्मिकान्तं कमलनयनम योगिर्भिन्दा नगम्यम बन्दे बिष्णु भवहरम सर्बलोकै नाथकम श्री भगवानुवाच: इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् | विवस्वानन् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकावे…
